नमस्कार दोस्तों मेरा नाम महेंद्र सिंह है
हेलो दोस्तों कैसे हैँ आप
हिन्दू धर्म में भगवान को भोग लगाने का विधान है। क्या सच में देवतागण भोग ग्रहण करते है? हां, ये सच है एवं शास्त्र में इसका प्रमाण भी है। गीता में भगवान कहते है ‘जो भक्त मेरे लिए प्रेम से पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेम पूर्वक अर्पण किया हुआ वह पुष्प आदि मैं ग्रहण करता हूँ।” गीता ९/२६
अब वे खाते कैसे है, ये समझना जरूरी है:
हम जो भी भोजन ग्रहण करते है, वे चीजे पांच तत्वों से बनी हुई होती है क्योकि हमारा शरीर भी पांचतत्वों से बना होता है। इसलिए अन्न, जल, वायु, प्रकाश और आकाश तत्व की हमें जरूरत होती है, जो हम अन्न और जल आदि के द्वारा प्राप्त करते है।
देवता का शरीर पांच तत्वों से नहीं बना होता, उनमें पृथ्वी और जल तत्व नहीं होता। मध्यम स्तर के देवताओ का शरीर तीन तत्वों से तथा उत्तम स्तर के देवता का शरीर दो तत्व -तेज और आकाश से बना हुआ होता है इसलिए देव शरीर वायुमय और तेजोमय होते है। यह देवता वायु के रूप में गंध, तेज के रूप में प्रकाश को और आकाश के रूप में शब्द को ग्रहण करते है।
यानी देवता गंध, प्रकाश और शब्द के द्वारा भोग ग्रहण करते है, जिसका विधान पूजा पद्धति में होता है। जैसे जो हम अन्न का भोग लगाते है , देवता उस अन्न की सुगंध को ग्रहण करते है, उसी से तृप्ति हो जाती है। जो पुष्प और धुप लगाते है,उसकी सुगंध को भी देवता भोग के रूप में ग्रहण करते है। हम जो दीपक जलाते है, उससे देवता प्रकाश तत्व को ग्रहण करते है। आरती का विधान भी उसी के लिए है। जो हम मंत्र पाठ करते है या जो शंख बजाते है या घंटी घड़ियाल बजाते है, उसे देवता गण कहते हैं
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